कांग्रेस ने सदैव ही भारत के साथ कॉम्प्रोमाइज़ करने का निंदनीय कृत्य किया हैं :- पंडित मोहनलाल

कांग्रेस ने सदैव ही भारत के साथ कॉम्प्रोमाइज़ करने का निंदनीय कृत्य किया हैं :- पंडित मोहनलाल

Congress has always Committed the Condemnable Act

Congress has always Committed the Condemnable Act

Congress has always Committed the Condemnable Act: कांग्रेस पार्टी एक ऐसा लालची स्वार्थी एवं महत्वाकांक्षी दल हैं । जिसका उद्देश्य राष्ट्र प्रथम नहीं बल्कि कुर्सी प्राप्त करना हैं । भारत माता की सेवा करने की बजाय कांग्रेस ने सदैव ही देशवासियों के साथ खिलवाड़ करते हुए देश की अस्मिता के साथ छेड़कानी करने का निरंतर जिस प्रकार निंदनीय कृत्य किया हैं वह बहुत ही ग़लत हैं।राहुल गांधी ने जिस तरह से ‘कंप्रोमाइज्ड’ शब्द का उपयोग कर रहे हैं, वास्तव में ‘कंप्रोमाइज्ड’ कौन है, आज देश को यह जानना आवश्यक है। इस पूरे सिलसिले में सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू का नाम आता है, किस प्रकार कंप्रोमाइज्ड नेहरू ने देश को भी कंप्रोमाइज्ड किया। जिन्हें कभी ‘चाचा नेहरू’ कहा जाता था, वे दरअसल ‘चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड’ थे और अब उन्हें इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। जब चाचा ही कंप्रोमाइज्ड थे तो देश की स्थिति क्या होगी, यह सहज समझा जा सकता है। चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड की जो गलतियां थीं, वो केवल अनजाने में हुई नीतिगत गलतियां नहीं थीं, बल्कि सोच-समझकर और जानबूझकर लिए गए फैसले थे, जिससे देश कंप्रोमाइज्ड हो।

चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड नेहरू के सचिवालय में सीआईए का इतना प्रभाव था कि उनके विशेष सहायक एम. ओ. मथाई को अमेरिकी एजेंट कहा जाता था। 1960 के दशक में रूस की एजेंसी केजीबी के एजेंट भी चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड के कार्यालय में मौजूद थे। चाहे एम. ओ. मथाई हों या केजीबी के एजेंट, उस समय सीआईए और केजीबी दोनों का ही नेहरू के कार्यालय पर दबदबा था। 60 और 70 के दशक में यह कहा जाता था कि नेहरू शासनकाल में विदेशी ताकतों को जिन दस्तावेजों की आवश्यकता होती थी, वे अमेरिका और रूस को आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड का देश की सुरक्षा के साथ किया गया यह गंभीर कॉम्प्रोमाइज था। आखिर राष्ट्रीय सुरक्षा इतनी खोखली क्यों बनाई गई कि देश के गुप्त दस्तावेज विदेशी हाथों में पहुंच जाते थे?

दूसरा विषय क्षेत्रीय समर्पण का है। चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड ने जब मन किया, भारत के नक्शे पर मानो स्केच पेन से रेखा खींचकर हिस्से बांट दिए कि कौन स हिस्सा पाकिस्तान को दिया जाए और कौन स चीन को। तिब्बत और अक्साई चीन की कहानी पूरा देश जानता है। 1954 के पंचशील समझौते हुआ, और इस समझौते के माध्यम से नेहरू ने तिब्बत को चीन को गिफ्ट में दे दिया। 1951 से अक्साई चीन क्षेत्र में, चीन सड़क बना रहा था, जिसकी जानकारी नेहरू सरकार को थी। उस समय के आईबी प्रमुख बी. एन. मुलिक ने स्पष्ट रूप से नेहरू और उनके मंत्रिमंडल को चेताया था कि चीन अक्साई चीन में सड़क निर्माण कर रहा है और भारत को इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए। 1951 में चीन की गतिविधियों की जानकारी दिए जाने के बावजूद 1959 तक इस विषय को नेहरू ने सार्वजनिक नहीं किया और संसद में उन्होंने इसे अफवाह बता दिया। चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड ने चीन को बचाने का पूरा प्रयास किया। इसी तरह, 1962 में बिना पर्याप्त सैन्य परामर्श, बिना  रसद और तैयारी के फॉरवर्ड पॉलिसी की नीति के तहत  जिस प्रकार से हमारी सेना को बिना यूनिफार्म, बिना कैनवस जूतों के बॉर्डर पर धकेला गया, यह एक आत्मघाती निर्णय था। नेहरू ने सेना की स्थापित हायरार्की और चेन ऑफ कमांड को दरकिनार कर अनुभवी अधिकारियों की जगह जनरल बी. एम. कौल को कमान सौंपी, जिनका नेहरू से पारिवारिक संबंध था। इसके परिणामस्वरूप 1962 के युद्ध का क्या परिणाम हुआ, यह भी देश ने देखा।नेहरू ने पश्चिम बंगाल सरकार को बिना सूचित किए और बिना किसी कैबिनेट कंसल्टेशन के, राज्य को अंधेरे में रखते हुए बेरूबारी के हिस्से को पाकिस्तान को देने का निर्णय लिया, जिसे नेहरू-नून समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत बेरूबारी पाकिस्तान को सौंप दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया और स्पष्ट कहा कि इस प्रकार राज्य से परामर्श किए बिना देश के हिस्से को नहीं सौंपा जा सकता लेकिन इसके बावजूद संविधान में नवें संशोधन के माध्यम से नेहरू ने बेरूबारी को पाकिस्तान को देने का कार्य किया। चाचा कॉम्प्रोमाइज्ड नेहरू ने देश को खंडित करने और एक-एक हिस्से को पाकिस्तान और चीन को सौंपने का कार्य किया। 1962 और 1964 के बीच सवर्ण सिंह और भुट्टो की वार्ता हुई, जिसके माध्यम से नेहरू पूंछ, उरी और गुरेज जैसी रणनीतिक घाटियों, जो महत्वपूर्ण स्ट्रेटेजिक लोकेशन्स हैं, उन्हें पाकिस्तान को सौंपने के लिए तैयार हो गए। यह नेहरू और उनके कॉम्प्रोमाइज के उदाहरण हैं। 1958 में ओमान के सुल्तान ने प्रस्ताव दिया था कि यदि भारत चाहे तो ग्वादर पोर्ट भारत को दिया जा सकता है, लेकिन नेहरू ने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि भारत ग्वादर पोर्ट नहीं लेगा। आज ग्वादर पोर्ट, चीन और पाकिस्तान के लिए कितनी महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान बन चुका है, यह सभी देख रहे हैं। नेहरू के 1958 के कॉम्प्रोमाइज का परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है। आखिर भारत की जमीन को विदेशों को देने के निर्णय क्यों लिए गए? नेहरू ने किस दबाव में यह निर्णय लिए? क्या चीन और पाकिस्तान ने नेहरू को रिश्वत दी थी? या चीन और पाकिस्तान उन्हें बड़े गिफ्ट देते थे? इन प्रश्नों के उत्तर आज की कांग्रेस नेतृत्व को देने चाहिए। आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है, जबकि 1950 में अमेरिका और 1955 में सोवियत संघ ने भारत को यूएनएससी का स्थायी सदस्य बनाने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को पत्र लिखकर कहा कि इससे चीन नाराज हो सकता है, इस लिए इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना चाहिए। नेहरू ने अमेरिका और रूस के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसमें भारत को यूएनएससी का परमानेंट मेंबर बनाने की बात कही गई थी, क्योंकि उनका प्रिय मित्र चीन नाराज हो सकता था। इसलिए उन्हें चाचा नेहरू नहीं बल्कि ‘चाचा कॉम्प्रोमाइज’ कहा जाना चाहिए। 27 सितंबर 1955 को नेहरू ने संसद में खड़े होकर कहा था कि अमेरिका और रूस ने भारत को परमानेंट सीट का कोई प्रस्ताव नहीं दिया, जबकि अब दस्तावेज सामने आ रहे हैं कि प्रस्ताव दिया गया था। पीओके के विषय को नेहरू, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर यूएन में उठाया।